ऋषिकेश कानिटकर ने भारत के लिए 2 टेस्ट और 34 एकदिवसीय मैचों में 1 अर्धशतक के साथ 413 रन बनाए और 17 विकेट लिए। 1998 में बांग्लादेश में आयोजित त्रिकोणीय श्रृंखला के फाइनल में पाकिस्तान के खिलाफ भारत को जीत दिलाने के लिए ऋषिकेश कानिटकर का नाम आने वाली पीढ़ियों द्वारा हमेशा याद रखा जाएगा. एक ऐसी अँधेरी शाम में, जहाँ सबकी धड़कनें बढ़ी हुई थी कानिटकर ने पाकिस्तान के चैंपियन स्पिनर सक़लैन मुश्ताक़ को ज़बरदस्त चौका जड़ कर भारत को एक गेंद शेष रहते ही खिताबी जीत दिलाई थी.
पूरा नाम -
ऋषिकेश हेमंत कानिटकर
जन्म - 14 नवंबर, 1974, पुणे, महाराष्ट्रप्रमुख टीमें - भारत, एयर इंडिया, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान
बल्लेबाजी शैली - बाएं हाथ के बल्लेबाज़
बॉलिंग स्टाइल - राइट-आर्म ऑफब्रेक
ऋषिकेश कानिटकर के बल्लेबाज़ी कीर्तिमान:
| बल्लेबाज़ी | मैच | रन | सर्वश्रेष्ठ | औसत | 100 | 50 |
| टेस्ट | 2 | 74 | 45 | 18.5 | 0 | 0 |
| एकदिवसीय | 34 | 339 | 57 | 17.84 | 0 | 1 |
| टी२० | - | - | - | - | - | - |
| प्रथम श्रेणी | 146 | 10400 | 290 | 52.26 | 33 | 46 |
| लिस्ट ए | 128 | 3526 | 133 | 35.26 | 6 | 21 |
| टी२० | 2 | 3 | 2 | 1.5 | 0 | 0 |
ऋषिकेश कानिटकर के गेंदबाज़ी कीर्तिमान:
| गेंदबाज़ी | मैच | विकेट | सर्वश्रेष्ठ | औसत | इकॉनमी |
| टेस्ट | 2 | 0 | - | - | 2 |
| एकदिवसीय | 34 | 17 | 2/22 | 47.23 | 4.78 |
| टी२० | - | - | - | - | - |
| प्रथम श्रेणी | 146 | 74 | 3/21 | 47.91 | 2.74 |
| लिस्ट ए | 128 | 70 | 4/35 | 39.64 | 4.78 |
| टी२० | 2 | - | - | - | - |
टेस्ट पदार्पण - ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत मेलबोर्न, दिसंबर 26, 1999
अंतिम टेस्ट - ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत सिडनी, जनवरी 2, 2000
एकदिवसीय पदार्पण - भारत बनाम श्रीलंका इंदौर, दिसंबर 25, 1997
अंतिम एकदिवसीय - ऑस्ट्रेलिया बनाम भारत पर्थ, जनवरी 30, 2000
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ऋषिकेश कानिटकर ने भारत के लिए 2 टेस्ट और 34 एकदिवसीय मैचों में 1 अर्धशतक के साथ 413 रन बनाए और 17 विकेट लिए। वहीँ घरेलु स्तर पर कानिटकर ने 146 प्रथम श्रेणी और 128 लिस्ट A मैचों में 39 शतक और 67 अर्धशतकों के साथ 13 हज़ार से ज़्यादा रन बनाए और 144 विकेट लिए।
ऋषिकेश कानिटकर एक स्पोर्टिंग फॅमिली से आते हैं। उनके पिता हेमंत कानिटकर ने भी भारत और महाराष्ट्र के लिए क्रिकेट खेला। ऋषिकेश कानिटकर के भाई आदित्य गोल्फ के प्लेयर थे और वहीँ उनकी भाभी राधिका तुलपुले पूर्व टेनिस खिलाड़ी रही हैं।
रोचक बात यह है की पिता हेमंत की ही तरह ऋषिकेश कानिटकर ने भी भारत के लिए 2 ही टेस्ट मैच खेले। ये विश्व क्रिकेट में इकलौता मामला है किसी बाप बेटे की जोड़ी का जहाँ दोनों ने बराबर संख्या के टेस्ट मैच खेले हों। हालाँकि ध्यान देने वाली बात ये है की ऋषिकेश ने 34 अंतर्राष्ट्रीय एकदिवसीय मैचों में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया।
पुणे से आने वाले बाएं हाथ के प्रतिभाशाली बल्लेबाज़ और दाएं हाथ के उपयोगी ऑफ स्पिनर ऋषिकेश कानिटकर ने 20 वर्ष की आयु में 1994 की रणजी ट्रॉफी में अपना प्रथम श्रेणी क्रिकेट पदार्पण किया। महाराष्ट्र के लिए मुंबई के विरुद्ध खेलते हुए कानिटकर ने 44 रन की पारी खेली और 1 विकेट भी लिया।
वर्ष 1997 आने तक भारतीय टीम में अच्छे आलराउंडर की कमी साफ़ साफ़ दिखने लगी थी। टीम में से नवजोत सिद्धू, संजय मांजरेकर, विनोद कांबली और मनोज प्रभाकर सरीखे खिलाड़ियों के अचानक निकल जाने से एक ऐसे खिलाड़ी की तलाश थी जो अच्छा बल्लेबाज़ होने के साथ साथ ही गेंदबाज़ी भी कर सके। ऋषिकेश कानिटकर को इसके फलस्वरूप 1997 से 2000 तक लगातार एकदिवसीय टीम में मौके मिले लेकिन रोबिन सिंह के बेहतर प्रदर्शन और युवा युवराज सिंह के आगमन के कारण कानिटकर अपनी जगह बचा नहीं सके और भारत के लिए अपनी प्रतिभा के अनुकूल प्रदर्शन करने में विफल रहे।
भारत के 1999 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर टेस्ट मैचों के बीच अजय जडेजा के चोटिल हो जाने के कारण ऋषिकेश कानिटकर को अकस्मात् कॉल किया गया। कानिटकर उस समय वेस्टइंडीज़ में भारत A टीम की कप्तानी कर रहे थे। इस सीरीज़ में कानिटकर ने अपना टेस्ट पदार्पण किया और खेले गए 2 मैचों में वे केवल 74 रन ही बना सके जिस में 45 का स्कोर सर्वोच्च था। भारतीय टीम के सभी बल्लेबाज़ ऑस्ट्रेलिया की मज़बूत गेंदबाज़ी के सामने बुरी तरह फेल हुए लेकिन कानिटकर को इस के बाद कभी भारत के लिए खेलने का अवसर नहीं मिला।
18 जनवरी, 1998 को ऋषिकेश कानिटकर अपने करियर का केवल तीसरा एकदिवसीय मैच खेल रहे थे और इस मैच में कुछ ऐसा चमत्कार कर गए जिसे एक भारतीय क्रिकेट फैन कभी नहीं भुला सकता। ढाका के मैदान पर पाकिस्तान और भारत के बीच इंडिपेंडेंस कप का फाइनल खेला जा रहा था और केवल 48 ओवर में 315 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए भारत को अंतिम 2 गेंदों पर जीत के लिए 3 रन चाहिए थे। दिग्गज स्पिनर सक़लैन मुश्ताक़ बोलिंग कर रहे थे और ढलती लाइट के चलते भारत की जीत की आशा बेहद कम थी। लेकिन कानिटकर ने सक़लैन की ओवर पिच गेंद को मिडविकेट से उड़ाकर चौका मारा और भारत को खिताब जिता दिया। इसके बाद कानिटकर रातो रात हीरो बन गए जिसे क्रिकेट की अगली जनरेशन तक ने याद रखा।
1994 से 2008 तक महाराष्ट्र के लिए 14 सफल रणजी सीज़नों के बाद कानिटकर ने मध्य प्रदेश की टीम के लिए खेलना शुरू किया और टीम की कप्तानी भी की। 2 साल तक एमपी के लिए खेलने के बाद 2010 में कानिटकर ने राजस्थान की टीम का रुख किया। कानिटकर की कप्तानी में 2010 और 2011 रणजी ट्रॉफी दोनों में राजस्थान की टीम को खिताबी जीत मिली।
रणजी क्रिकेट में ऋषिकेश कानिटकर एक लेजेंड रहे हैं। 19 वर्ष के लम्बे रणजी करियर में कानिटकर ने 105 मैचों में 8059 रन बनाए, जो रणजी इतिहास में वसीम जाफर और अमोल मुजुमदार के बाद सबसे ज़्यादा हैं।
क्रिकेट से सन्यास के बाद कानिटकर ने कोचिंग का रुख किया और आईपीएल 2016 संस्करण में उन्हें राइजिंग पुणे सुपरजायंट्स के फील्डिंग कोच के लिए चुना गया। कानिटकर ने खुद भविष्य में नेशनल क्रिकेट अकादमी और भारतीय टीम के कोच बनने के लिए इच्छा ज़ाहिर की है।
कानिटकर एक सच्चे आलराउंडर थे। बल्ले के साथ बेहतरीन, और एक उपयोगी ऑफ स्पिनर होने के साथ ही ऋषिकेश कानिटकर अपनी शानदार फील्डिंग के लिए भी जाने जाते थे। 2000 की ऑस्ट्रेलिया में खेली गई त्रिकोणीय श्रंखला के एक मैच में पाकिस्तान के विरुद्ध कुंबले गेंदबाज़ी कर रहे थे। स्ट्राइक पर दिग्गज बल्लेबाज़ इंज़माम-उल-हक़ थे और उनके लॉफ्टेड शॉट को बॉउंड्री पर फील्डिंग कर रहे कानिटकर ने हवा में उछलते हुए, एक हाथ से कैच कर अपनी उम्दा फील्डिंग का बढ़िया प्रदर्शन किया।










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